जशपुर में विश्व आदिवासी अधिकार दिवस कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता लखन सुबोध ने आदिवासी अधिकारों, संवैधानिक सुरक्षा, डिलिस्टिंग के सवाल और वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक शक्ति निर्माण का पक्ष रखा।


जशपुर 17 सितम्बर 2026। बीते दिवस सर्व आदिवासी समाज के तत्वाधान में कम्युनिटी हॉल जशपुर में विश्व आदिवासी अधिकार दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में स्थानीय आदिवासी समाज के लोगों के साथ विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधि, बुजुर्ग, युवा, महिलाएं, छात्र-छात्राएं, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत सर्व आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों एवं उपस्थित सामाजिक कार्यकर्ताओं की उत्साह पूर्वक भागीदारी हुई। मंच संचालन गोसनर टैप्पो (सेवानिवृत्त प्राचार्य, जशपुर) ने किया और स्वागत भाषण सभीनंद खलखो ने किया। कार्यक्रम के आरंभ में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित की गई तथा अतिथियों को शाल भेंट कर सम्मान किया गया। इस अवसर पर रांची, झारखंड से आए जगन्नाथ उरांव (सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी झारखंड पुलिस) तथा पुनेउ उरांव (सेवानिवृत्त District Development Officer) सहित आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने विशेष रूप से भाग लिया तथा अपने अपने विचार रखे।

विशिष्ट अतिथियों के विचार से यह प्रमुखता से सामने आया कि आदिवासी समाज केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, सामुदायिक जीवन और मानवता की महत्वपूर्ण धरोहर है। इसलिए आदिवासी समाज के अधिकारों, पहचान और संवैधानिक सुरक्षा की रक्षा केवल आदिवासी समाज का ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण प्रश्न है।आयोजन के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता लखन सुबोध (केंद्रीय संयोजक, गुरुघासीदास सेवादार संघ GSS) , प्रखर चिंतक, जनसंगठन कर्ता, संयोजक धर्म निरपेक्ष राज्य पक्षधर धार्मिक संगठनों का मोर्चा एवं विभिन्न जन आंदोलनों के सूत्रधार ने अपने एक घंटा के विस्तृत वक्तव्य को पाँच क्रमबद्ध भागों में विभाजित करते हुए कहा कि, किसी भी अधिकार के प्रश्न को समझने के लिए उसके इतिहास, वर्तमान स्थिति, समाधान,संगठनात्मक एकता और भविष्य की रणनीति को एक साथ समझना आवश्यक है।आदिवासी अधिकार और उसका ऐतिहासिक आधार पर कहा कि आदिवासी अधिकारों को केवल किसी एक सरकारी योजना या आरक्षण के प्रश्न तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। आदिवासी अधिकारों में सामुदायिक पहचान, संस्कृति, परंपरा, जल-जंगल-जमीन पर अधिकार, ग्राम सभा की भूमिका, राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा धार्मिक स्वतंत्रता जैसे व्यापक प्रश्न शामिल हैं।

इन्होंने आगे कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक का व्यक्तिगत संवैधानिक अधिकार है। कोई व्यक्ति किस धर्म को माने, किस धार्मिक पहचान को स्वीकार करे या न करे,यह उसका व्यक्तिगत अधिकार है। लेकिन किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान को आधार बनाकर पूरे आदिवासी समुदाय की सामुदायिक, सामाजिक, भौगोलिक और संवैधानिक पहचान को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने आदिवासी अधिकारों के ऐतिहासिक विकास, संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर आदिवासी अधिकारों की चर्चा तथा भारतीय संविधान द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आदिवासी अधिकारों को आंबेडकरी संविधान की लोकतांत्रिक और समानतावादी भावना के संदर्भ में समझना आवश्यक है।वर्तमान स्थिति और आदिवासी अधिकारों पर संकट के निराकरण पर कहा कि, आज आदिवासी समाज के सामने सबसे गंभीर प्रश्न जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा का है। और आरोप लगाया कि विभिन्न क्षेत्रों में कॉर्पोरेट हितों और विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासी समुदायों के पारंपरिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है तथा कई मायनों पर ग्राम सभाओं की वास्तविक भूमिका सामुदायिक अधिकारों की उपेक्षा की जा रही है।
पाचवीं अनुसूची, PESA कानून और वन अधिकार अधिनियम (FRA) जैसे प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन को आवश्यक बताते हुए कहा कि, कानूनों का अस्तित्व तभी सार्थक है, जब उनका वास्तविक लाभ ग्राम स्तर पर आदिवासी समुदाय को मिले।इसी क्रम में उन्होंने डिलिस्टिंग के प्रश्न पर भी अपनी चिंता व्यक्त की एवं कहा कि धार्मिक पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति के आदिवासी अधिकारों अथवा पूरे समुदाय की संवैधानिक सुरक्षा को प्रभावित करना गंभीर प्रश्न है। उनके अनुसार, व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और आदिवासी समुदाय की सामुदायिक पहचान-दोनों को अलग-अलग संवैधानिक प्रश्नों के रूप में समझना होगा।यदि धार्मिक पहचान को आधार बनाकर आदिवासी समुदायों को संवैधानिक सुरक्षा से बाहर करने की कोशिश होती है, तो इसका प्रभाव केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अनुसूचित क्षेत्रों, पाँचवीं अनुसूची, PESA और वन अधिकारों जैसे महत्वपूर्ण अधिकारों पर भी पड़ सकता है। क्योंकि डीलिस्टिंग की मांग करने वाले जल,जंगल,जमीन को लूटने वालों के हाथों खेल रहे हैं, क्योंकि यदि धार्मिक आधार पर डीलिस्टिंग होता है और सामुदायिक आदिवासी अस्मिता को नजरंदाज कर दिया जाता है, तो कई क्षेत्रों में आदिवासियों की संख्या का प्रतिशत इतना घट सकता है कि, आदिवासी जनसंख्या के बहुमत के आधार पर जो संवैधानिक अधिकार का संरक्षण प्राप्त है वह खत्म हो जाएगा और इसी चालबाजी को धर्म की आड़ में डीलिस्टिंग की बात कही जा रही है और इससे जल, जंगल, जमीन को लूटने वालों को आदिवासी संवैधानिक संरक्षण खत्म हो जाने से वे मनमानी तरीके से लूट का तांडव करेंगे।
समाधान हेतु आदिवासी अधिकारों की रक्षा का रास्ता केवल शिकायत करने में नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की जानकारी, कानूनी अधिकारों के इस्तेमाल, ग्राम सभा की मजबूती और व्यापक जनसंगठन में है। यह भी कहा कि आज धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रश्नों पर व्यापक स्तर पर संघर्ष की आवश्यकता है। उनके वक्तव्य अनुसार, ऐसी राजनीतिक-सामाजिक विचारधाराओं का लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से मुकाबला करना होगा, जो समाज में असमानता और वर्चस्व को बढ़ावा देती है उन्होंने आगे कहा कि यह संघर्ष केवल आदिवासी समाज का संघर्ष नहीं है।दलित,आदिवासी, श्रमिक, वंचित और लोकतांत्रिक एवं स्वतंत्र विचार रखने वाले सभी समुदायों के अधिकारों को जोड़कर व्यापक जनएकता तैयार करना आवश्यक है।
साझा मोर्चा और वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर अलग-अलग संगठन अपने-अपने स्तर पर संघर्ष करते रहेंगे तो उनकी शक्ति सीमित रहेगी। इसलिए आदिवासी समाज के विभिन्न संगठनों के बीच साझा मोर्चा बनाना समय की आवश्यकता है।
यह साझा मोर्चा किसी एक राजनीतिक दल का पिछलग्गू नहीं होगा, बल्कि संवैधानिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और जनहित को केंद्र में रखकर काम करेगा।आदिवासी केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निर्णायक शक्ति बन सकता है। जब आदिवासी और अन्य वंचित समुदाय अपने अधिकारों के प्रश्न पर संगठित होंगे, तब सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।गुरुघासीदास सेवादार संघ (GSS) के साथ विभिन्न आदिवासी संगठनों के साझा संघर्ष की दिशा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया और कहा कि इसका उद्देश्य एक ऐसी वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण की दिशा में काम करना होगा।श्री सुबोध ने कहा कि, जब आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन और देश के तमाम मेहनतकश अवाम को लूटने, धार्मिक नफरती ध्रुवीकरण करने वाले एक ही राजनैतिक सामाजिक शक्तियां हैं, तो हम सभी शोषित जन अलग-अलग क्यों? इसलिए शोषक वर्ग को परास्त करने के लिए हम सभी विभिन्न तबकों को साझा साझी विरासत और साझा संघर्ष का विजन-मिशन लेकर आगे बढ़ना होगा।
वैकल्पिक शक्ति के लिए साधन निर्माण और भविष्य की रणनीति पर कहा कि, केवल विचार और घोषणा से कोई बड़ा सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। इसके लिए संगठन, प्रशिक्षित कार्यकर्ता, जनसंपर्क, वैचारिक प्रशिक्षण, आर्थिक आत्मनिर्भरता और निरंतर जन-अभियान जैसे साधनों का निर्माण करना होगा।
आदिवासी युवाओं, महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया तथा कहा कि आने वाले समय में विभिन्न जिलों में जनजागरण, अधिकार प्रशिक्षण, संगठन निर्माण और संवैधानिक अधिकारों की जानकारी से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
भविष्य की रणनीति केवल चुनाव तक सीमित नहीं होगी, बल्कि जनता के बीच वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक शक्ति के निर्माण की दिशा में निरंतर काम करना होगा। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि, जशपुर में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक दिवसीय आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकारों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों को व्यापक स्तर पर उठाने की शुरुआत है।आयोजकों के अनुसार, विभिन्न आदिवासी संगठनों के बीच साझा मंच और सामूहिक संघर्ष की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा। आगामी दिनों में छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जिलों में समान कार्यक्रम आयोजित करने तथा एक राज्यव्यापी आदिवासी अधिकार महाअभियान प्रारंभ करने की दिशा में काम किया जाएगा।आदिवासी अधिकारों के प्रति जन-जागरण, संवैधानिक प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा, ग्राम सभाओं को मजबूत करना, धार्मिक एवं नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आदिवासी समाज की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना। इस अवसर पर गुरुघासीदास सेवादार संघ (GSS) के वरिष्ठ पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं में एम. डी. सतनाम (केंद्रीय संगठक GSS), अजय अनंत (ऑफिस सचिव GSS), वीरेंद्र भारद्वाज (प्रवक्ता GSS) तथा रूपदास टंडन (जिला संयोजक, मुंगेली) उपस्थित रहे।

संपादक सिद्धार्थ न्यूज़

