July 21, 2026

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का वो ऐतिहासिक फैसला:73 वां और 74 वां संविधान संशोधन जिसने देश के हर नागरिक को दिया अपने गांव-शहर का ‘प्रधान’ मंत्री बनने का अधिकार।

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पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का वो ऐतिहासिक फैसला:73 वां और 74 वां संविधान संशोधन जिसने देश के हर नागरिक को दिया अपने गांव-शहर का ‘प्रधान’ मंत्री बनने का अधिकार।

 

तरुण खटकर की ✍️….से (07 जुलाई 2026)

भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में केवल दिल्ली (केंद्र) की सरकार या राज्यों की सरकार से हर गांव और शहर का विकास नहीं किया जा सकता। इसी सोच के साथ पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने देश में स्थानीय स्वशासन की नींव रखी, जिसका मतलब है—स्थानीय लोगों द्वारा अपने क्षेत्र का शासन खुद चलाना।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ‘सत्ता को सीधे जनता के हाथों में सौंपने’ के दृष्टिकोण को अमलीजामा पहनाते हुए साल 1992 में संसद द्वारा 73वां और 74वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया, जिसने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल दिया।

आइए, इस ऐतिहासिक बदलाव को शुरुआत से आसान भाषा में समझते हैं।

1992 से पहले: अधिकारियों का विकेंद्रीकरण था, लोकतंत्र का नहीं

साल 1992 से पहले भारत में मुख्य रूप से द्वि-स्तरीय शासन व्यवस्था थी—केंद्र सरकार और राज्य सरकार। हालांकि,आजादी के बाद से ही देश में पंचायतें और नगरपालिकाएं मौजूद थीं, लेकिन उनके पास कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी।

उस समय की व्यवस्था में चार बड़ी कमियां थीं:

संवैधानिक दर्जे का अभाव:* संविधान के नीति निर्देशक तत्वों (अनुच्छेद 40) में पंचायतों का जिक्र तो था, लेकिन राज्यों के लिए इन्हें बनाना अनिवार्य नहीं था।

चुनावों में अनिश्चितता: स्थानीय निकायों के चुनाव समय पर नहीं होते थे। कई राज्यों में पंचायतें भंग होने के बाद 10 से 15 साल तक चुनाव ही नहीं कराए जाते थे और सरकारी अधिकारी ही वहां का काम देखते थे।

आर्थिक तंगी:* गांवों और शहरों के पास टैक्स वसूलने या धन जुटाने के अपने अधिकार नहीं थे। उन्हें हर छोटे काम के लिए सरकार पर निर्भर रहना पड़ता था।

भागीदारी की कमी:* महिलाओं, OBC, (SC) और (ST) के लिए स्थानीय स्तर पर कोई अनिवार्य आरक्षण नहीं था।

संक्षेप में कहें तो, 1992 से पहले अधिकारियों का विकेंद्रीकरण तो था (कलेक्टर और बाबू जमीन पर थे), लेकिन लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण नहीं था। सत्ता कुछ ही हाथों में सिमटी थी।

*ऐतिहासिक बदलाव:* द्वि-स्तरीय से त्रि-स्तरीय भारत का उदय

1992 के इन दो ऐतिहासिक कानूनों ने भारत को द्वि-स्तरीय से त्रि-स्तरीय लोकतांत्रिक देश बना दिया:

73वां संविधान संशोधन* (ग्रामीण क्षेत्रों के लिए): यह कानून पूरी तरह से ग्रामीण भारत (पंचायती राज) को मजबूत करने के लिए बनाया गया, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ। इसके तहत संविधान में भाग-9 और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई। पंचायतों को विकास के लिए 29 विषय (जैसे- कृषि, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़कें और गरीबी उन्मूलन योजनाएं) सौंपे गए।

74वां संविधान संशोधन* (शहरी क्षेत्रों के लिए): यह कानून शहरी भारत (नगर निकायों) को व्यवस्थित करने के लिए बनाया गया, जो 1 जून 1993 से लागू हुआ। इसके तहत संविधान में भाग-9ए और 12वीं अनुसूची जोड़ी गई। शहरी निकायों को 18 विषय (जैसे- शहरी नियोजन, सड़कें, जल आपूर्ति और सार्वजनिक स्वास्थ्य) सौंपे गए।

स्थानीय शासन की त्रि-स्तरीय संरचना

ग्रामीण क्षेत्र (पंचायती राज):

ग्राम स्तर (सबसे नीचे): ग्राम पंचायत (नेतृत्व: ‘सरपंच’ या ‘प्रधान’)। इसकी बुनियाद ग्राम सभा है, जिसमें गांव के सभी मतदाता शामिल होते हैं।

ब्लॉक स्तर (बीच में): जनपद पंचायत / पंचायत समिति।

जिला स्तर (सबसे ऊपर): जिला पंचायत (पूरे जिले की ग्रामीण व्यवस्था की कमान)।

शहरी क्षेत्र (नगरीय निकाय):

संक्रमणकालीन क्षेत्र: नगर पंचायत (गांव से शहर में बदल रहे इलाके)।

छोटे शहरी क्षेत्र: नगर पालिका परिषद (मध्यम आकार के शहर)।

बड़े महानगरीय क्षेत्र: नगर निगम (नेतृत्व: महापौर/मेयर और निगम आयुक्त)।

इन संशोधनों की 5 सबसे क्रांतिकारी बातें

इन दोनों कानूनों ने स्थानीय सरकारों को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुछ कड़े नियम अनिवार्य कर दिए:

हर 5 साल में नियमित चुनाव: अब कोई भी राज्य सरकार अपनी मर्जी से चुनावों को टाल नहीं सकती। यदि कोई निकाय समय से पहले भंग होता है, तो 6 महीने के भीतर चुनाव कराना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

महिलाओं को महाशक्ति:* स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित की गईं। (छत्तीसगढ़, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50% कर दिया है)।

SC/ST/OBC वर्ग को अधिकार:* अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लोगों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में अनिवार्य रूप से आरक्षण दिया गया।

*स्वतंत्र राज्य चुनाव आयोग:* चुनावों में किसी भी तरह के राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए हर राज्य में एक स्वतंत्र ‘राज्य चुनाव आयोग’ का गठन किया गया।

राज्य वित्त आयोग:* पंचायतों और नगरपालिकाओं को पैसों की कमी न हो, इसके लिए हर 5 साल में ‘राज्य वित्त आयोग’ के गठन का प्रावधान किया गया, जो टैक्स और विकास की राशि का हिस्सा सीधे इन स्थानीय संस्थाओं को हस्तांतरित करता है।

73वें और 74वें संविधान संशोधन ने भारत में लोकतंत्र को केवल ‘संसद’ और ‘विधानसभा’ तक सीमित न रखकर हर नागरिक के दरवाजे तक पहुंचा दिया। इसी का नतीजा है कि आज एक आम ग्रामीण या शहरी नागरिक अपनी स्थानीय समस्याओं (जैसे नाली, सड़क, पानी, बिजली) के लिए सीधे अपने जनप्रतिनिधि (पंच, सरपंच, जनपद सदस्य अध्यक्ष,जिला पंचायत सदस्य अध्यक्ष…पार्षद, अध्यक्ष, महापौर) से सवाल कर सकता है और अपने गांव या शहर की सरकार खुद चुन सकता है। इस कानून ने सही मायनों में भारत के आम आदमी को अपने क्षेत्र का ‘प्रधान’ मंत्री बनने की शक्ति दी है।

(लेखक पंचायती राज के विश्लेषक हैं।)

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