November 2, 2026

गुरुघासीदास सेवादार संघ (GSS) के तत्वाधान में सतनाम धर्म को विधिक मान्यता, कोड एवं जनगणना संबंधी विचार गोष्ठी संपन्न हुआ।

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बिलासपुर 23 अक्टूबर 2026। विगत दिवस सतनाम भवन,ग्राम सरसेनी (मस्तूरी), जिला–बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में सतनाम धर्म से जुड़े सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक विषयों को लेकर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इस विचार गोष्ठी के मुख्य वक्ता वीरेंद्र भारद्वाज ने कहा कि GSS प्रमुख लखन सुबोध ने गुरुघासीदास के सतनाम आंदोलन को समाज के समक्ष लिखित रूप से प्रस्तुत कर हमें इतिहास से रूबरू कराया। गुरुघासीदास जी का सतनाम धर्म– गैरबराबरी के खिलाफ शोषित, पीड़ित एवं उपेक्षित वर्गों के समान अधिकार, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय के लिए प्रवर्तित किया गया था। यह आंदोलन किसी राजनीतिक सौदेबाजी या सत्ता-लाभ का साधन नहीं था। उन्होंने कहा कि गुरुबालकदास जी की हत्या के बाद सतनाम समाज के सही इतिहास को मिटाने के उद्देश्य से कुछ दलालों एवं गद्दारों को गुरु के रूप में गद्दी पर बैठाया गया, जो आज तक सतनाम धर्मियों के बीच गुरु बनकर विभिन्न राजनीतिक दलों की दलाली करते आ रहे हैं।

उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि चुनाव के समय ये लोग मौसमी मेंढक की भांति सतनामी हितैषी बनकर “जय जय सतनाम” के नारे लगाते हैं और समुदाय से वोट मांगते हैं, किंतु जब सतनाम धर्म को विधिक मान्यता दिलाने, स्वतंत्र धर्म-कोड बनाने अथवा जनगणना में सतनाम धर्म का स्वतंत्र विकल्प दिलाने की बात आती है, तो ये लोग समाज के बजाय अपनी पार्टी के वफादार बन जाते हैं। उन्होंने चेताया कि अब सतनाम समुदाय उन जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछेगा जिन्हें उसने वोट दिया है। यदि वे सतनाम धर्म के असली मुद्दों को संसद एवं विधानसभा में प्रभावी रूप से नहीं उठाएंगे, तो समाज अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन कर अपनी वैध मांगें मनवाने के लिए बाध्य होगा। जनगणना कमेटी बनने के 26 वर्ष बाद, भारत में पहली जनगणना 1881 में सतनामी, सतनाम धर्म की अलग पहचान दर्ज की गई थी। जो आज भी हमारे दिलों में अंगार बनकर धधक रहा है।सह-वक्ता सुशील अनंत ने कहा कि, गुरुघासीदास जी ने मनुवादी व्यवस्था जातिवाद, सामंतवाद और सामाजिक असमानता के विरुद्ध “जाति-तोड़क, समाज-जोड़क” की दृष्टि दी थी। उन्होंने कहा कि सतनाम धर्म की विरासत को राजनीतिक स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ का औजार बनने से बचाना प्रत्येक सतनामी का कर्तव्य है।एडवोकेट महेश आर्य ने सतनाम धर्म की विधिक मान्यता एवं स्वतंत्र धर्म-कोड के संवैधानिक पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जनगणना 2027 में धर्म के कालम में “सतनाम धर्म” का स्पष्ट एवं स्वतंत्र विकल्प दिया जाना आवश्यक है, ताकि समाज की वास्तविक जनसंख्या, पहचान एवं अधिकारों का सही लेखा-जोखा हो सके।

संतोष सोल्डे ने कहा कि, सतनाम धर्म के पक्ष में केवल नारों से काम नहीं चलेगा; इसके लिए संगठित जन-आंदोलन, विधिक संघर्ष एवं सचेत नागरिक सहभागिता आवश्यक है। जब तक कानून नहीं बनेगा; मैदान में आकर डटकर मुकाबला करेंगे।गोष्ठी में वक्ताओं ने रायपुर स्थित सतनाम प्लाजा के बंदरबाट होने पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सतनाम समाज की आस्था, गरिमा एवं सामूहिक अधिकार से जुड़े स्थल का उपयोग किसी व्यक्तिगत, सांप्रदायिक अथवा राजनीतिक हित के लिए किया जाना पूर्णतः अस्वीकार्य है। वक्ताओं ने मांग की कि सतनाम धर्म स्थल का प्रशासन, नियंत्रण एवं उपयोग सतनाम समाज के हित में पारदर्शी एवं जवाबदेह ढंग से हो, तथा इसके दुरुपयोग में संलिप्त व्यक्तियों से उत्तरदायित्व तय किया जाए।आगे यह भी कहा गया कि सतनाम धर्म के हित में समाज के सचेत व्यक्तियों, सामाजिक संगठनों, छात्रों, महिलाओं, किसानों, श्रमिकों एवं सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध संस्थाओं से साझा मोर्चा बनाया जाएगा। विधायकों, सांसदों को ज्ञापन सौंपने हेतु हस्ताक्षर अभियान में शामिल होने प्रस्ताव रखा। गोष्ठी के अंत में संकल्प लिया गया कि जब तक समाज से निर्वाचित होकर कोई व्यक्ति प्रबंधन संचालित नहीं करेगा। तब तक किसी भी ढोंगी को गुरु नहीं मांगेंगे। जनगणना 2027 में सतनाम धर्म का स्वतंत्र विकल्प, सतनाम धर्म की विधिक मान्यता, स्वतंत्र धर्म-कोड तथा सतनाम धर्म स्थल की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेंगे, यदि आवश्यकता हुई, तो रायपुर में अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। कार्यक्रम का संचालन फ़िरत मिरी ने किया । कार्यक्रम में हरप्रसाद, राजा, राजेश कुमार, ललित सूरज छत्त कुमार , अरुण,आर्यन एवं नारायण सोल्डे सहित सामाजिक सदस्य उपस्थित थे। इस आशय की जानकारी जिला संगठक बिलासपुर के संतोष सोल्डे,एड. महेश आर्य ने दी।

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