ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ इंडिया (टी यू सी आई) ने छ ग़ राज्य के श्रम विभाग के सचिव को भेजी अपनी आपत्तियां।
रायपुर 18 मई 2026 । ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ इंडिया (टी यू सी आई) ने छत्तीसगढ़ शासन के श्रम कानून नियमों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए बीते दिनों श्रम सचिव को अपनी आपत्तियां भेजी हैं। अपनी आपत्तियों में बताया है कि औद्योगिक संबंध संहिता 2026 जो कि अभी तक मौजूद तीन कानूनों/ नियमों को समाप्त कर नया कानून लाया जा रहा है जो कानून राज्य में मेहनतकशों खासकर बड़ी संख्या में असंगठित श्रमिकों के अधिकारों पर हमला है। यह पूरी तरह मोदी सरकार द्वारा लाए गए कॉरपोरेट परस्त श्रमिक- कर्मचारी विरोधी 4 श्रम कोड की अनुशंसा में बनाया गया है। यह संहिता “श्रम सुधार” के नाम पर पूंजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों को मजदूरों का शोषण करने के लिए और अधिक छूट देता है जबकि मजदूरों की सामूहिक ताकत को कमजोर करता है। छ ग़ राज्य टी यू सी आई के संयोजक सौरा ने अपनी आपत्तियां कुछ बिंदुओं में राज्य सरकार के श्रम सचिव को अवगत कराएं हैं।
सौरा ने बताया कि हड़ताल के अधिकार पर कठोर नियंत्रण किया जा रहा है। पहले केवल “जन-उपयोगी सेवाओं” (public utility services) में हड़ताल से पहले नोटिस जरूरी था। अब लगभग सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कम से कम 14 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य कर दिया गया है। जबकि संघ के अनुसार सरकार का उद्देश्य कॉरपोरेट घरानों द्वारा मजदूरों के अधिकारों पर बढ़ रहे हमलों के खिलाफ होने वाले श्रमिक प्रतिरोध को लगभग असंभव बनाना है। नोटिस अवधि में प्रबंधन द्वारा दमन, छंटनी करना या पुलिस हस्तक्षेप कर सकता है अवैध हड़ताल घोषित कर मजदूरों पर कार्रवाई आसान हो जाती है। सरकार का यह नया कानून व्यावहारिक रूप से असंवैधानिक है तथा लोकतांत्रिक अधिकार को खत्म करना या सीमित करने जैसा है। नया कानून वहीं छंटनी और कारखाना बंदी को आसान बनाता है। पहले 100 से अधिक मजदूरों वाले उद्योगों को छंटनी, तालाबंदी या बंदी के लिए सरकारी अनुमति लेनी पड़ती थी। अब यह सीमा 300 कर दी गई है। इसका मतलब है कि 299 तक मजदूर वाले हजारों कारखाने बिना सरकारी अनुमति का मालिक मजदूरों को काम से निकाल सकते हैं, स्थायी रोजगार और नौकरी सुरक्षा खत्म हो जायेगा। और यूनियन के गतिविधियों में सक्रिय मजदूरों को निशाना बनाना आसान हो सकता है। राज्य में अधिकांश फैक्ट्रियाँ 300 से कम श्रमिकों वाली हैं, इसलिए इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है।
स्थायी रोजगार की जगह अस्थायीकरण“Fixed Term Employment” को बढ़ावा देने से कंपनियाँ: कुछ महीनों/वर्षों के अनुबंध पर मजदूर रख सकती हैं, काम खत्म होते ही बिना स्थायीकरण का हटाया जा सकता है।हालाँकि कानून कहता है कि उन्हें स्थायी कर्मचारियों जैसी सुविधाएँ मिलेंगी, लेकिन संघ का मानना है: नौकरी की स्थिरता अर्थात गारंटी खत्म हो जाती है, यूनियन बनाने का साहस कम हो जायेगा औऱ श्रमिक हमेशा असुरक्षा महसूस करते रहेंगें। जब काम कराओ जब निकाल बाहर करो “hire and fire” मॉडल की ओर बढ़ने जैसा माना जाता है। ट्रेड यूनियनों को कमजोर करने की संभावना कानून में “Negotiating Union” के लिए 51% सदस्यता की शर्त रखी गई है। व्यवहारिक समस्या:- कई कारखानों में अनेक यूनियनें होती हैं, 51% न होने पर प्रबंधन-समर्थक यूनियन को बढ़त मिल सकती है,छोटे, लड़ाकू या स्वतंत्र यूनियनों की भूमिका सीमित हो सकती है। हम इसे यूनियन बहुलता और लोकतांत्रिक श्रमिक राजनीति पर नियंत्रण के रूप में देखते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विशेष प्रभाव छत्तीसगढ़ जैसे खनन और भारी उद्योग वाले राज्यों में इसका असर अधिक गहरा हो सकता है:- कोयला, बिजली, इस्पात और खदान क्षेत्रों में ठेका श्रमिकों की संख्या बढ़ सकता है।भू-विस्थापितों के रोजगार अधिकार कमजोर हो सकते हैं, SECL, NTPC, निजी खदानों और निजी औद्योगिक परियोजनाओं में अस्थायीकरण बढ़ सकता है, यूनियन आधारित संघर्षों पर प्रशासनिक दमन आसान हो सकता है।
संघ का मानना है कि इस नियम में वर्णित शासकीय सेवक संघ की परिभाषा का आशय केवल नियमित स्थाई कर्मचारियों को ही संबोधित करना है।इसके अनुसार अनियमित,संविदा,,कैजुअल और ठेका श्रमिकों को संगठित होकर अपनी मांगों को पूरा करने के अधिकारों से वंचित करना है।यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। इन्होंने आगे बताया कि छत्तीसगढ़ की नई श्रम संहिता नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य श्रम बाजार को कॉरपोरेट पूंजी के लिए अधिक “लचीला” बनाना है।जबकि होना ये चाहिए कि राज्य सरकार ठेका प्रथा “हायर एंड फायर” या अनुबंध आधारित अस्थाई श्रम को हतोत्साहित करते हुए स्थाई काम को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दे। साथ ही श्रम विवादों के निपटारे के लिए उच्च स्तरीय कमेटी या शिकायत निवारण समिति को ज्यादा महत्व दिया गया है। बल्कि ट्रेड यूनियनों के हड़ताल प्रदर्शन समेत तमाम लोकतांत्रिक रास्तों का सम्मान किया जाना चाहिए।क्योंकि श्रम विवाद निपटारा समिति नहीं बल्कि मजदूरों के लंबे संघर्ष से अर्जित ट्रेड यूनियन बनाने और संघर्ष का अधिकार ही मजदूरों खासकर असंगठित श्रमिकों के लिए प्रमुख विकल्प है।

संपादक सिद्धार्थ न्यूज़
