सफलता का नया मंत्र: चादर छोटी है तो क्या ….”सपनों” के पैर फैलाना सीखिए।

तरुण खटकर की कलम से!
सफलता का असली अर्थ खुद को सीमाओं में बांधना नहीं, बल्कि सीमाओं को पार करने का साहस दिखाना है।
सदियों से हमें यह सीख दी गई कि जितनी लंबी चादर हो उतने ही पैर फैलाने चाहिए,
लेकिन यह विचार हमें केवल संतोष करना सिखाता है, शिखर पर पहुँचना नहीं।
अगर एक बीज अपनी मिट्टी की गहराई और अंधेरे से डरकर खुद को सिकोड़ ले, तो वह कभी एक विशाल वृक्ष नहीं बन पाएगा।
उसे बाहर निकलना ही पड़ता है, उस मिट्टी की चादर को फाड़ना ही पड़ता है, तभी वह आकाश को छू पाता है।
दुनिया में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, उनके पास शुरुआत में संसाधनों की ‘चादर’ बहुत छोटी थी। अगर वे यह सोचते कि उनके पास पर्याप्त धन,अवसर या सुविधाएं नहीं हैं और उन्हें अपनी सीमाओं में ही रहना चाहिए, तो आज वो महान नही होते।
उन्होंने अभावों की चिंता किए बिना अपने सपनों के ‘पैर फैलाए’। जब पैर चादर से बाहर निकले, तो संघर्ष की ठंड ने उन्हें परेशान जरूर किया, लेकिन उसी परेशानी ने उन्हें इतना सामर्थ्यवान बना दिया कि उन्होंने अपनी मेहनत से सफलता का एक नया और विशाल आसमान बना लिया।
हकीकत तो यह है कि जब आप चादर की परवाह किए बिना पैर फैलाते हैं, तो आप अपनी असुविधा को कमी को”
अपनी ‘शक्ति’ बना लेते हैं। वह अभाव आपको हर पल याद दिलाता है कि आपको अपना “चादर” और बड़ा करना है।
पैर सिकोड़कर सो जाना बहुत आसान है, उसमें कोई संघर्ष नहीं है, लेकिन उसमें कोई विकास भी नहीं है। विकास हमेशा असुविधा की कोख से जन्म लेता है।
अतः, यदि आप जीवन में कुछ असाधारण हासिल करना चाहते हैं, तो आज ही अपनी छोटी सोच और सीमित संसाधनों की चादर का मोह त्याग दीजिए। अपने लक्ष्य इतने बड़े रखिए कि आपकी वर्तमान स्थिति छोटी पड़ जाए।
जब आप पूरे आत्मविश्वास के साथ पैर फैलाएंगे, तो कुदरत खुद-ब-खुद आपको वे रास्ते दिखाएगी जिनसे आप अपनी सफलता की चादर को बड़ा कर सकें।
याद रखिए, महानता उन लोगों के हिस्से आती है जो अपनी चादर को अपनी औकात नहीं, बल्कि अपनी अगली चुनौती मानते हैं।

संपादक सिद्धार्थ न्यूज़

