जलकुंभी और जीवन के सिद्धांत: क्या ‘कुछ भी करने की चाह’ ही असली तरक्की है?

तरुण खटकर की ✍️……से,, 13 जुलाई 2026
यह एक कड़वी मगर शाश्वत सच्चाई है कि समाज में बुराई और नकारात्मकता को पैर पसारने के लिए किसी विशेष प्रयास या ‘खाद-पानी’ की जरूरत नहीं होती।
वे जलकुंभी की तरह खुद-ब-खुद पनपते हैं और देखते ही देखते पूरे तालाब के अस्तित्व को संकट में डाल देते हैं।
आज का मानव जीवन, उसकी अंधी महत्वाकांक्षाएं और तथाकथित ‘सफलता की दौड़’ भी इसी जलकुंभी रूपी मानसिकता का शिकार हो चुकी है।
जब कोई व्यक्ति जीवन में नैतिक मूल्यों और ईमानदारी का रास्ता चुनता है, तो उसकी रफ्तार अक्सर धीमी हो जाती है।
क्योंकि सिद्धांत उसे सीमाओं में बांधते हैं—वे उसे गलत कदम उठाने या शॉर्टकट अपनाने से रोकते हैं। और कुछ भी अनैतिक करके सफलता हासिल करने से डरता है।
इसके विपरीत, (आज के दौर का एक नया ‘मंत्र’) “तरक्की के लिए कुछ भी करने को तैयार रहो।”
जैसे ही कोई व्यक्ति अपने सारे नैतिक बंधनों को तोड़कर हर जायज-नाजायज हथकंडे को अपनाने को राजी होता है, वह जलकुंभी की तरह बहुत तेजी से फैलने लगता है। उसे न तो बदनामी का डर होता है और न ही अंतरात्मा की आवाज का।
लेकिन क्या यह वास्तव में तरक्की है?* जिस तरह जलकुंभी तालाब को ऊपर से हरा-भरा दिखाती है, लेकिन अंदर ही अंदर उसका ऑक्सीजन सोखकर उसे ‘नाकारा’ बना देती है;
ठीक वैसे ही अनैतिक तरक्की इंसान को बाहर से समृद्ध दिखा सकती है, मगर अंदर से उसकी इंसानियत और मानसिक शांति को खत्म कर देती है।
प्रकृति और समय का एक अटल नियम है*—अति का अंत निश्चित है। जलकुंभी चाहे कितनी भी तेजी से क्यों न फैले, एक उचित समय आने पर उसे जड़ से उखाड़ फेंका जाता है, और तालाब फिर से स्वच्छ व उपयोगी हो जाता है।
इतिहास गवाह है कि गलत तरीके से हासिल की गई सफलता का साम्राज्य भी समय के एक थपेड़े से ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है।
यदि तरक्की की कीमत आपके सिद्धांत और आपका चरित्र है, तो वह विकास नहीं बल्कि पतन की शुरुआत है।
आज समाज को जलकुंभी जैसी आक्रामक और विनाशकारी सफलता की नहीं, बल्कि ‘बरगद’ जैसे व्यक्तित्वों की जरूरत है—
जिसकी रफ्तार भले ही धीमी हो, लेकिन जड़ें गहरी हों और जो सदियों तक समाज को सहारा और छांव दे सके।
अंततः, समाज की भलाई और स्थिरता सिद्धांतों की रक्षा में ही निहित है।

संपादक सिद्धार्थ न्यूज़

