August 1, 2026

जीएसटी घटा, महंगाई बढ़ी’आम आदमी की थाली महंगी, दवाई और इलाज महंगा, डीजल पेट्रोल गैस महंगी,सोना चांदी महंगा,2 व्हीलर, 4 व्हीलर महंगी, रोजमर्रा की हर चीजें महंगी।

IMG-20260726-WA0007

।।सोशल एक्टिविस्ट तरुण खटकर (रायपुर छ ग) की कलम से “26 जुलाई 2026″।।

पिछले त्योहारी सीजन में सरकार ने एक बड़े सुधार के तहत जीएसटी (GST) दरों में 10 प्रतिशत तक की कटौती करने का दावा किया था। आम जनता को उम्मीद थी कि इस कदम से उन्हें महंगाई से राहत मिलेगी, उनकी जेब का बोझ कम होगा और रोजमर्रा की चीजें सस्ती होंगी। लेकिन ठीक इसका उलटा हुआ।

जीएसटी दर कम होने के बाद, भी राशन सामग्री, हरी सब्जियां, पेट्रोल, डीज़ल, सोना, गाड़ी ,दवाई,कपड़े—संक्षेप में, आम आदमी के रोजमर्रा की हर चीज़—की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो गई है। यह कैसा जीएसटी कटौती है?

एक सोशल एक्टिविस्ट के तौर पर मैं सरकार के इस कदम और उसके नतीजों पर अपनी कड़ी आपती और गहरी चिंता व्यक्त करता हूँ।

सरकार ने यह तर्क दिया था कि जीएसटी में 10% कटौती का सीधा लाभ उपभोक्ताओं को मिलेगा। जिससे महंगाई की मार झेल रही आम आदमी को राहत मिलेगी मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जिस उम्मीद से जनता ने इस फैसले का स्वागत किया था, वह अब निराशा में बदल गई है।

राशन के दाम आसमान छू रहे हैं।चावल ,आटा,दाल, तेल, मसाले, और खासकर हरी सब्जियों की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि गरीब आदमी,आम आदमी और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए दो वक्त की पौष्टिक रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया है।

लगातार बढ़ रहे दामों से ऐसा लगता है जैसे मुनाफाखोरों को खुली छूट मिल गई है, जिन्होंने जीएसटी कटौती का लाभ जनता तक पहुंचाने के बजाय, खुद ही अपनी तिजोरी भरने का काम शुरू कर दिया है।

पेट्रोल डीजल गैस की कीमतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर परिवहन लागत को प्रभावित करती हैं, और यह बढ़ोतरी अंततः हर उत्पाद की अंतिम कीमत में जुड़ जाती है। यानी, जब पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, तो आपकी थाली की सब्जी से लेकर आपके पहनने के कपड़े तक सब कुछ महंगा हो जाता है।

यहां तक कि निवेश या आवश्यकता की श्रेणी में आने वाली वस्तुएं, जैसे सोना, जमीन ,बीमा, भी आम आदमी की पहुंच से दूर हो रहे हैं।

सरकार की नीयत पर सवाल*

यह समझना बहुत जरूरी है कि केवल करों (Tax) में कमी कर देने से महंगाई अपने आप कम नहीं हो जाती। यदि बाजार में निगरानी (Monitoring), कड़े नियम और पूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को नियंत्रित करने की इच्छाशक्ति न हो, तो यह कटौती केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने एक बड़ा फैसला तो ले लिया, लेकिन यह सुनिश्चित करने में पूरी तरह विफल रही कि उद्योग जगत और व्यापारी वर्ग ईमानदारी से इस लाभ को उपभोक्ता तक पहुंचाएँ। यह नीतिगत विफलता (Policy Failure) का एक स्पष्ट उदाहरण है।

*मेरा सरकार से सीधा सवाल है:

जीएसटी कटौती के बाद कीमतों में यह बेतहाशा वृद्धि क्यों हुई? क्या आपके पास बाजार को नियंत्रित करने के लिए कोई तंत्र नहीं है?

क्या यह कटौती केवल राजनीतिक लाभ लेने का एक जरिया थी, जिसका क्रियान्वयन (Implementation) चुनावो के बाद आपने व्यापारिक समूहों के भरोसे छोड़ दिया?

आप उन मुनाफाखोरों पर क्या कार्रवाई कर रहे हैं जो टैक्स घटने के बावजूद कीमतें बढ़ा रहे हैं?

सरकार को तत्काल प्रभाव से बाजार में कड़ी निगरानी शुरू करनी चाहिए। एंटी-प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी (Anti-Profiteering Authority) को सक्रिय किया जाए और जो उत्पादक, व्यपारी जीएसटी कटौती के बाद दामों में वृद्धि कर दिए जिससे महंगाई बढ़ी और जीएसटी में 10% कटौती का लाभ ग्राहकों तक नहीं पहुंचा रहे हैं, उन पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

आम आदमी इस उम्मीद में बैठा है कि सरकार उसके जीवन को थोड़ा आसान बनाएगी, न कि उसकी रोजमर्रा की ज़िंदगी को और मुश्किल करेगी।

महंगाई पर नियंत्रण चुनाव से पहले का नारा नहीं, बल्कि शासन की मूलभूत जिम्मेदारी है। सरकार को जनता के इस ‘महंगाई के उपहार’ पर जवाब देना होगा

और ठोस कदम उठाने होंगे।

 

Recent posts