July 21, 2026

बाबा साहब डॉ अंबेडकर जातिवाद और गैर बराबरी वाली वर्णव्यवस्था को मानवता का दुश्मन और इंसानियत के लिए खतरा मानते … थे!

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।।सोशल एक्टिविस्ट तरुण खटकर की कलम से।।

रायपुर छत्तीसगढ़ 27 जून 2026/ बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का पूरा जीवन जातिवाद और वर्णव्यवस्था जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ एक निर्णायक संघर्ष की गाथा है। उन्होंने इसे केवल एक सामाजिक कुरीति नहीं माना, बल्कि इसे मानवता का दुश्मन और इंसानियत के लिए सबसे बड़ा खतरा करार दिया। डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जिस समाज में इंसान को इंसान नहीं समझा जाता, वह समाज कभी प्रगति नहीं कर सकता। उन्होंने जातिवाद और वर्णव्यवस्था को भारतीय समाज की उन बेड़ियों के रूप में देखा, जिन्होंने न केवल करोड़ों लोगों को अपमानित किया, बल्कि देश की आर्थिक और नैतिक जड़ों को भी खोखला कर दिया।

 

बाबा साहब के अनुसार, वर्णव्यवस्था केवल ‘श्रम का विभाजन’ नहीं थी, बल्कि यह ‘समाज का विभाजन’ था। उन्होंने तर्क दिया कि वर्णव्यवस्था ने समाज को ऊँच-नीच की ऐसी सीढ़ियों में बाँट दिया जहाँ ऊपर जाने का कोई रास्ता नहीं था। और इस व्यवस्था ने व्यक्ति की योग्यता के बजाय उसके जन्म को प्रधानता दी, जिससे करोड़ों लोगों की प्रतिभा का गला घोंट दिया गया।

 

डॉ. अंबेडकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (Annihilation of Caste) में स्पष्ट किया कि जातिवाद मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का सबसे बड़ा बाधक है।जातिवाद व्यक्ति को संकीर्ण दायरे में कैद कर देता है, जिससे वह पूरी मानवता के बारे में सोचना बंद कर देता है। उन्होंने जातिवाद के सबसे वीभत्स रूप ‘छुआछूत’ को मानवता पर एक काला धब्बा माना। उनके लिए, किसी मनुष्य को छूने से अपवित्र हो जाना ईश्वर और इंसानियत दोनों का अपमान था।

 

बाबा साहब का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है जब तक कि सामाजिक लोकतंत्र स्थापित न हो जाए। “एक व्यक्ति, एक वोट” का मूल्य तब तक सार्थक नहीं है जब तक समाज में “एक व्यक्ति, एक मूल्य” का सिद्धांत लागू न हो। उन्होंने संविधान के माध्यम से जातिगत भेदभाव को गैरकानूनी बनाया और आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं के जरिए वंचितों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया, ताकि एक समतामूलक समाज का निर्माण हो सके।

 

डॉ अंबेडकर के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने दशकों पहले थे। वे हमें याद दिलाते हैं कि जब तक समाज में जाति के नाम पर दीवारें मौजूद हैं, तब तक वास्तविक मानवता का उदय नहीं हो सकता।

उनके सपनों का भारत वही है जहाँ हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार हो और उसकी पहचान उसके काम और चरित्र से हो, न कि उसके जन्म के आधार पर मिले जाति से। “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” — यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि जातिवाद और गरीबी के अंधेरे से निकलने का एकमात्र मार्ग है।

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