September 15, 2026

9 अगस्त विश्व मूलनिवासी दिवस पर विशेष:पूरी दुनिया में कॉरपोरेट आधारित विकास की आड़ में विनाश का शिकार हो रहे हैं आदिवासी – तुहिन

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विश्व मूलनिवासी/आदिवासी दिवस में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एशिया, अफ्रीका,दक्षिण अमेरिका,अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया में यूरोपियन उपनिवेशवाद या उसकी तथाकथित सभ्यता ,वहां के मूल निवासियों की लाशों के ऊपर ही फला फूला है। इसमें शामिल है अफ्रीका में क्रूर यूरोपियन उपनिवेशवादियों द्वारा हीरा सहित अन्य खनिज संसाधनों को हड़पने के लिए किए गए रोंगटे खड़े करने वाले जनसंहार,अंगों को काटना और बलपूर्वक अफ्रीकी जनता को उनकी जमीन से अपहरण कर दास व्यवसाय के जरिए मुनाफा का पहाड़ खड़ा किया जाना ब्रिटेन,फ्रांस,बेल्जियम,हॉलैंड,डेनमार्क,स्पेन,पुर्तगाल की समृद्धि और वैभव, दास व्यवसाय तथा एशिया,अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के उपनिवेशों की भयानक लूट से ही संभव हो पाया है।अमरीका की खोज के बाद एक ओर तो उपनिवेशवादियों ने रेड इंडियनों के रक्त मांस के ढेर पर अपना साम्राज्य खड़ा किया तो दूसरी ओर अफ्रीका से जहाज भर भर कर दासों के जरिए अमरीका को आबाद बनाने का कार्य किया।अफ्रीका से अमरीका लाते समय जहाज के खोल में बिना भोजन,पानी,हवा के छोटी सी जगह में अफ्रीकी मूल के लोगों के हाथ और पैरों में कीलें ठोक कर बांध कर रखा जाता था।जिससे आधे गुलाम तो यात्रा के दरम्यान ही मर जाते थे।बाकी जो बचे रहते वे अमरीका के गोरे बागान मालिकों के भयावह अत्याचार का शिकार होते।अगर अत्याचार सहन नहीं कर सकने के कारण वे गुलामी से बचने के लिए भागने का प्रयास करते और पकड़े जाते तो गोरे बागान मालिक ,उन अफ्रीकी गुलामों को या तो लिंचिंग कर सूली पर चढ़ाते या फिर उनकी हथेलियों को काटकर ट्रॉफी के रूप में रखते।अफ्रीकी मूल के अश्वेत गुलामों को टाइट करने के लिए गोरे बागान मालिकों ने ” क्लू क्लक्स क्लान” नामक श्वेत रंगभेदी हत्यारों के दल का गठन किया था।उक्त फासिस्ट आतंकी संगठन की मौजूदगी आज भी अमरीका में है।ठीक वैसे ही जैसे भारत में फासिस्ट संघ परिवार का कोई भी आनुषंगिक संगठन है।जिस तरह कौटिल्य के” अर्थशास्त्र ” में मौर्य राजवंश के शत्रु विद्रोही आदिवासी कबीलों को खत्म करने के लिए कड़ी शराब और विष प्रयोग का भी सहारा लिया गया था,ठीक उसी तरह अमरीका के स्थानीय आदिवासियों ( रेडस्किन) के सफाया के लिए भी यूरोपियन उपनिवेशवादियों ने इसी प्रकार के तरीकों का भी प्रयोग किया था।दक्षिण अमेरिका में सोने का खजाना” एल डोराडो” की कहानी भी यूरोपियन उपनिवेशवादियों के इसी निर्मम अत्याचार से जुड़ी है। पेरू में इनका मूल निवासियों के राजा थे अतहुअल्पा।स्पेनी सेनापति पिजारो ने मित्रता वार्ता के नाम पर धोखे से अतहुअलपा को बंदी बना लिया। रेड इंडियन समुदाय के राजा को छुड़ाने के लिए उनके बेटे और परिजन पिजारो की मांग के अनुसार कई बैल गाड़ियों में सोना भर कर पेरू के कुजको में जहां अतहुअल्प बंदी था यात्रा शुरू किए।आधे रास्ते में उन्हें पता चला कि स्पेनी सेनापति पिजारो ने इनका राजा अतहुअल्पा की यातना देकर हत्या कर दी है।यह समाचार सुनने के बाद इंका समुदाय के लोगों ने विशाल मात्रा में सोने को गला कर एक बहुत बड़ा सोने की जंजीर बनवाया और इसे स्पेनी उपनिवेशवादियों को न सौंप कर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में गाड़ दिया।इस गुप्त खजाने को जिसे ” एल डोराडो” कहते हैं,की तलाश में कई सौ बरसों से स्वर्णलोभी यूरोपियन दुस्साहसिक अभियान चला चुके हैं।इसी कथानक पर हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म” मकानस गोल्ड” बनी है।उपनिवेशों की प्राकृतिक संपदा की निर्मम लूट और मूलनिवासियों के नस्लीय सफाया को ही साम्राज्यवादी इतिहासकार और चिंतक “गोरी चमड़ी का दायित्व या तथाकथित सभ्यता” कहते हैं।

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में अमरीकी साम्राज्यवाद के नेतृत्ववाले साम्राज्यवादी गुट द्वारा लैटिन अमेरिकी देशों की नवउपनिवेशिक लूट के खिलाफ बोलिविया,वेनेजुएला,अर्जेंटीना आदि देशों में मूल निवासी रेड इंडियन समुदाय और मेहनतकश वर्ग , प्रतिरोध में उठ खड़े हुए ।बोलिविया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व कर रहे मूल निवासी समुदाय के इवो मोरालेस राष्ट्रपति चुनाव में जीत कर अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों जो तेल व्यापार पर नियंत्रण करती थी का राष्ट्रीयकरण कर दिया।उनके और वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज के अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने और अमरीकी हितों पर चोट करने के कारण साम्राज्यवादी ताकतों के साथ इनकी ठन गई और अमरीका ने इन सरकारों को अपदस्थ करने के बहुतेरे प्रयास किए।एक दक्षिण अमेरिका के ये राष्ट्रप्रधान जो मूलनिवासियों और देश की प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिए अपने सरकार तक को दांव पर लगा दिए और दूसरी ओर हमारे देश में देखिए मणिपुर सहित पूरे देश में मानवता जमीन पर लोट रही है लेकिन दलित या आदिवासी सर्वोच्च पद पर रहने के बावजूद चूं तक आवाज नहीं आती।

हमारे देश में भी कॉरपोरेट घरानों द्वारा जल,जंगल , जमीन की अंधाधुंध लूट के लिए बड़े पैमाने पर आदिवासियों के विनाश को संघी मनुवादी /ब्राम्हणवादी फासिस्ट और अन्य शासक वर्ग,विकास कहते हैं।मोदी सरकार द्वारा अडानी जैसे कॉरपोरेट घरानों के हित में प्राकृतिक संपदा की लूट की इस मुहिम में गैर भाजपा राज्य सरकारें भी कॉरपोरेट घरानों की दलाली कर उनका साथ देती हैं।

हमें हमारे देश के संदर्भ में एक बात और याद रखनी है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके देशी दलाल सामंतवाद के खिलाफ आजादी की लड़ाई में सबसे ज्यादा बलिदान आदिवासियों ने दिया है।१८५७ के बहुत पहले छोटा नागपुर (झारखंड) में सबसे पहले अमर शहीद बाबा तिलका मांझी के नेतृत्व में विद्रोह का बिगुल फूंका गया।उसके बाद बंगाल का चुआड़ विद्रोह,सिद्धू, कानू ,चांद,भैरव , फूलो, झूनो के नेतृत्व में संथाल हूल,बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उलगुलान मुंडा विद्रोह,अल्लुरी सीताराम राजू का गिरिजन विद्रोह(आंध्र प्रदेश),छत्तीसगढ़ में वीर नारायण सिंह के नेतृत्व में सोनाखान विद्रोह,गुंडाधुर के नेतृत्व में बस्तर विद्रोह(दोनों छत्तीसगढ़),रानी गाइडलों के नेतृत्व में नागा विद्रोह के अलावा मध्य प्रदेश,राजस्थान,बंगाल,असम,मिजोरम,मणिपुर,तमिलनाडु,कर्नाटक,केरल,गुजरात,महाराष्ट्र,बिहार समेत पूरे देश में आदिवासियों द्वारा अनेकों आंदोलन व विद्रोह अपनी आजादी तथा जल जंगल जमीन की लूट के खिलाफ किए गए।लेकिन मुख्यधारा के इतिहासकार और बुद्धिजीवी जो कुलीन वर्ग के थे और ब्रिटिश साम्राज्य के अनुगत थे ने इनकी उपेक्षा की और पाठ्य पुस्तकों/इतिहास लेखन में इनके योगदान को स्थान नहीं दिया गया।मौजूदा परिस्थिति में मणिपुर में धधकते जातीय आग की लपटों को देखकर फिर ऐसा लग रहा है कि आरएसएस मनुवादी फासिस्ट,कॉरपोरेट घरानों को मणिपुर के जल, जंगल, जमीन को लूटने की मार्ग को प्रशस्त करने के लिए कुकी आदिवासी समुदाय जो जंगल पहाड़ों पर निवास करते हैं के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर चुके हैं।और इसके लिए अपने नफ़रत और विभाजन के जहर से गैर आदिवासी मैतेई समुदायऔर मणिपुर पुलिस बल को सराबोर कर चुके हैं।

कॉरपोरेट घरानों के विकास मॉडल का शिकार सबसे ज्यादा आदिवासी समुदाय हो रहा है।सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश की कुल आबादी में आदिवासी 9 फीसदी हैं लेकिन कॉरपोरेट घरानों के क्रूर लूट के शिकार अपनी जमीन से विस्थापित लोगों में 56 फीसदी आदिवासी जनता है।फासिस्ट संघ परिवार के हिंदुराष्ट्र में( जिसकी परिकल्पना अति अमीर धन्नासेठ अडानी,अंबानी जैसे कॉरपोरेट के लिए ही की गई है) आदिवासियों की क्या हालत होगी वो तो सीधी( मध्य प्रदेश) में भाजपा नेता द्वारा आदिवासी युवक पर पेशाब करने की घटना से साफ हो जाती है।वैसे भी दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी फासीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ RSS की परिभाषा के अनुसार आदिवासी,आदिवासी नहीं बल्कि वनवासी हैं।आदिवासियों को भारत का मूलनिवासी मान लेने पर RSS को बहुत परेशानी होगी क्योंकि फासिस्ट संघ परिवार के अनुसार आर्य ,मध्य एशिया से नहीं आए बल्कि वो इस देश के मूलनिवासी हैं।जबकि सच इसके उलट है।1964 से छत्तीसगढ़ के जशपुर में आर एस एस ने सबसे पहले वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना कर आदिवासियों का हिंदूकरण करने का काम शुरू कर दिया था।जबकि सनातनीयो ने उन्हें कभी भी हिंदू नहीं माना।असल में आरएसएस/ भाजपा के संविधान ” मनुस्मृति” में दलितों, पिछड़ों,आदिवासियों,महिलाओं और तमाम मेहनतकशों को शुद्र/ अतिशुद्र मानकर उन्हें मानवीय गरिमा से वंचित रखा गया है।आज जरूरत इस बात की है कि कॉरपोरेट पूंजी पर आधारित विकास जो असल में आदिवासियों और पर्यावरण का विनाश कर रहा है और जिसके लठैत हैं संघी मनुवादी फासिस्ट ताकतें,के खिलाफ जनता को संगठित कर जनपक्षीय वैकल्पिक विकास और शोषण,लूट से रहित समतावादी जाति उन्मूलन आधारित वैज्ञानिक चेतना युक्त सच्चे लोकतंत्र के लिए लड़ा जाय।

(लेखक क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच ( कसम) के महासचिव हैं)

संपर्क- 9425560952( मोबाइल)

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